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निबंध लेखन: आत्मकथा: ‘घायल सैनिक की आत्मकथा’ Autobiography of a Wounded Soldier | Ghayal Sainik Ki Atmakatha Hindi Essay

निबंध लेखन: आत्मकथा

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घायल सैनिक की आत्मकथा - Hindi Essay

२. ‘घायल सैनिक की आत्मकथा’

‘‘भरा नहीं जो भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।’’

जी हाँ, मेरी आत्मकथा रंगीन नहीं, रोमांचक है, विलास से ही नहीं साहस से भी भरी हुई है। मैं हूँ भारतीय सैनिक! मेरा जन्म सह्याद्रि के पहाड़ी प्रदेश में हुआ था। हमारे इलाके में खेती-बाड़ी के लायक जमीन बहुत कम थी, इसलिए बहुत से लोग सेना में भर्ती हो जाते थे। हमें बचपन से ही विशेष रूप से शारीरिक तालीम दी जाती थी। मेरे दादाजी एक सैनिक थे। मेरे पिता भी एक सैनिक थे और अनेक वर्षों तक सेना में रहकर भारत माता की सेवा करने का अवसर प्राप्त किया था। मेरे मन में भी पिताजी की तरह एक सैनिक बनकर भारत माता की सेवा करने की प्रबल अभिलाषा थी। अंततः जवान होते-होते मैंने घुड़सवारी, तैरना, पहाड़ पर चढ़ना सीख लिया।

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आखिर वह दिन मेरे जीवन में आ ही गया, जिसका मुझे हर पल इंतजार रहता था। मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। मैं महाराष्ट्र के एक सैनिक स्कूल में भर्ती हो गया। चंद दिनों में ही मेरी मेहनत रंग लाई, मैंने सैनिक शिक्षा प्राप्त कर ली। मशीनगन, राइफल, टैंक, तोप आदि चलाने में निपुण हो गया। साथ ही कार, मोटर, ट्रक चलाने में भी अनेक प्रमाण पत्र प्राप्त किए। युद्ध स्थल की कार्यवाही, फायरिंग और गोलंदाजी का काफी अनुभव भी प्राप्त किया।

मुझे सबसे पहले भारत-चीन सीमा पर भेजा गया। मैं वहाँ अपने साथियों के साथ देश की रक्षा करने में लगा ही था तभी अक्तूबर, १९६२ में एक दिन चीनी सैनिकों ने हमारी चौकी पर अचानक हमला कर दिया। वे सैकड़ों थे, जबकि हम कुल ३० थे, फिर हमने उन्हें नाको चने चबवा दिए। अकेले मैंने ४० चीनियों को मौत के घाट उतार दिया था। परन्तु दुःख तब ज्यादा हुआ जब हमें पता चला कि हमारे २० सैनिक भाई शहीद हो गए। तीन-चार सौ सैनिकों के सामने हम दस कहाँ तक टिक पाते? तभी पता चला कि हमारी सहायता के लिए सैकड़ों भारतीय सैनिक आ गए हैं। हमारी ताकत बढ़ते देखकर चीनी सैनिक नौ दो ग्यारह हो गए।

सन् १९६२ में चीन से और १९६५ में मैं पाकिस्तानी सेना से लड़ा। १९६५ में तो मैं अपने बहादुर साथियों के साथ लाहौर तक चला गया। यदि ताशकंद समझौता न होता तो हमारी छावनी लाहौर में होती। युद्ध विराम के बाद मैं अपने गाँव लौटा। माँ खुशी के मारे पागल हो गई। पत्नी और मुन्ना दोनों बहुत प्रसन्न हुए। गाँव के लोगों को मैंने अपने अनुभव सुनाए। लेकिन कुछ समय के बाद पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। देश के रक्षा यज्ञ में अपनी आहुति देने के लिए मैं चल पड़ा। कश्मीर सीमा पर हमने जी-जान से पाकिस्तानी सैनिकों का सामना किया। इस भिड़ंत में मेरे दाहिने पैर में गोलियाँ लगी, फिर भी तुरन्त इलाज किए जाने से मैं बच गया।

मुझे अपनी वीरता के उपलक्ष्य में भारत सरकार से ‘वीरचक्र’ प्राप्त हुआ। आज मुझमें पहले जैसी शक्ति नहीं रही है। फिर भी मुझे इसका गम नहीं है तथा युद्ध में लगे घाव तो मेरे जीवन के अमूल्य आभूषण हैं। अवसर आने पर अपने प्राण तक न्योछावर कर दूँगा। पिछले साल कारगिल युद्ध में वीरता दिखाने के लिए मेरे बेटे को भी ‘वीरचक्र’ प्रदान किया गया था। अच्छा, अब आज्ञा चाहता हूँ।

‘‘तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ, देश की धरती! तुझे कुछ और भी दूँ।।’’