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निबंध लेखन: आत्मकथा : एक बाढ़ पीड़ित की आत्मकथा Hindi Autobiography Essays: Flood Victim

निबंध लेखन: आत्मकथा

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बाढ़ पीड़ित की व्यथा - आत्मकथात्मक निबंध

१. ‘एक बाढ़ पीड़ित की आत्मकथा’

‘‘नदियाँ चले-चले रे धारा
चंदा चले-चले रे तारा
तुझको चलना होगा.....’’

जी हाँ! मैं एक बाढ़ पीड़ित हूँ। आज भी मेरी आँखों में नदी की वह तांडव नृत्य करती हुई विनाशकारी लहरें आ जाती हैं। जो नदी अपने शीतल व मीठे जल से सभी गाँव वासियों को सुखमय जीवन प्रदान कर रही थी। किसी ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि जीवन देने वाली यह नदी इतनी निर्दयता एवं क्रूरता के साथ जीवन को छीन लेगी। मेरा परिवार छोटा था और सुखी था। मैं था, मेरी पत्नी थी और दो छोटे-छोटे बच्चे थे, जो अभी स्कूल जाना शुरु किए थे। पास-पड़ोस और मेरा पूरा गाँव सुखी व खुशहाल था। भला, हम गाँव वालों में से कोई भी इतनी विनाशकारी, अनिष्टता की कल्पना कैसे कर सकता था।

परन्तु हमारे इस सुखी जीवन को देखना प्रकृति को भी नहीं सुहाया। कष्टकारी भयंकर गर्मी के बाद बरखा रानी का आगमन हुआ। शीतल बूँदें पड़ने लगीं। चारों तरफ से धरती की सोंधी-सोंधी सुगंध पूरे वातावरण में फैल गई। आषाढ़ बरसा, सावन बरसा। गाँव की नदी एकाएक पागल हो गई। आज तक उसने सारे गाँव को अपना शीतल व मधुर जल पिलाया था, परन्तु आज वह समस्त गाँव को मानो निगल जाना चाहती थी।

सारा गाँव नींद की बेखबर दुनिया में डूबा हुआ था। पूर्णिमा की चाँदनी रात थी। फिर भी बाहर अंधेरा छाया हुआ था। भयंकर गड़गड़ाहट के साथ मूसलाधार पानी बरस रहा था। अचानक हहर-हहर का हृदय को कँपा देने वाला शोर गूँज उठा। लोग डर कर उठ बैठे। मैंने बाहर आकर देखा कि नदी दरवाजे पर दस्तक दे रही अतिथि की तरह घर के अंदर आने की तैयारी कर रही थी। पूरे गाँव का यही हाल था। अपनी जान बचाने के लिए हम सबने भागने की निष्फल कोशिश की। भाग कर जाते भी कहाँ? आखिर छत पर चढ़ गए। मैं ऊपर से नदी की प्रलयकारी लीला देख रहा था। इतने में छत का कुछ हिस्सा धँसने लगा। देखते ही देखते कौन जाने क्या हो गया। इसके बाद जब मेरी आँख खुली तो अपने आप को जिला अस्पताल में पाया। मैं तो बच गया, लेकिन नदी मेरे परिवार को आहार बनाकर निगल गई।

नदी का पानी घट जाने के बाद मैं रोते-बिलखते हृदय की असीम पीड़ा को दबाए अपने गाँव पहुँचा। मैंने देखा मेरा गाँव अब गाँव नहीं एक विराना लावारिश खंडहर मात्र बचा था। जहाँ मेरा घर था जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा, ओह! मेरे बच्चों की स्लेट दिखाई पड़ी जो एक टूटे दीवार पर टँगी हुई थी। उस समय मेरे कानों में अपने बच्चों की वही चीख चीत्कार गूँजने लगी, जब वे मुझसे सहायता के लिए पुकार रहे थे। मैं विवश लाचार चाहकर भी कुछ न कर सका और मैंने तुरन्त उस गाँव का आजीवन के लिए त्याग कर दिया। आज मेरी पत्नी तथा बच्चों की मधुर यादें ही हैं, जिसके सहारे मैं अपनी बाकी बची जिंदगी को बाढ़ द्वारा दिया हुआ अभिशाप समझकर गुजार लूँगा।

गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा।
हाफिज खुदा तुम्हारा।।
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