निबंध लेखन: आत्मकथा
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३. बूढ़े किसान की आत्मकथा
आइए, बाबूजी, बैठिए। शीतल जल पीजिए। मैं एक बूढ़ा किसान हूँ। लोग मुझे ‘अन्नदाता’ के नाम से पुकारते हैं। मैं गाँव में साधारण-सी झोपड़ी में रहता हूँ। आपके शहर में कितना भी बदलाव आ गया हो, पर भारत का किसान आज भी अपनी संस्कृति को नहीं भूला है। मैं अतिथि को देवता मानता हूँ। आप मेरी रामकहानी सुनना चाहते हैं, तो सुनिए।
मेरा छोटा-सा परिवार है, और हम सब हमेशा खेती के कार्य में जुटे रहते हैं। मैं सुबह हल-बैल लेकर खेत पर चला जाता हूँ। मुझे सर्दी, गर्मी, आँधी या तूफान की परवाह नहीं है, क्योंकि जन्म से ही मैं इन सारी परिस्थितियों का सामना करता आया हूँ। मैं खेत पर अनेक प्रकार के काम करता हूँ। जैसे- खुदाई, जुताई बुआई और बाद में सिंचाई का काम भी मुझे ही करना पड़ता है। दोपहर को मैं खाना खाता हूँ और बैलों को भी घास खिलाता हूँ।
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50+ Hindi Composition Collectionश्रम ही मेरा जीवन है। चाहे आसमान में चिलचिलाती धूप हो या हड्डियों को कँपा देने वाली सर्दी हो या जोरों की बारिश। मेरा काम कभी रूकता नहीं। मुझे सबके पेट भरने की चिंता लगी रहती है। खेत में फसल पकने पर उसके चोरी हो जाने का या जंगली जानवरों से नष्ट होने का भय लगा रहता है। अतः मुझे रखवाली के लिए रात भर खेत पर रहना पड़ता है। मेरे इस काम में मेरा पुत्र व पत्नी साथ देते हैं।
अब जमाना बदल गया है। हम लोगों के जीवन में काम करने के तरीकों में तथा अनाज आदि संग्रह करने तथा उसे बेचने आदि के संबंध में अनेक सुविधाएँ प्राप्त होने लगी हैं। पहले जागीरदार और धनी लोग हमारा शोषण करते थे और हम हमेशा कर्ज में डूबे रहते थे। अब हमें सरकार की तरफ से अच्छे बीज, बैल खरीदने के लिए लोन और अन्य अनेक सुविधाएँ भी मिलने लगी हैं। अब यंत्रों से खेती होने लगी है। इसमें श्रम कम करना पड़ता है और अधिक फसल मिलती है।
शिक्षा के प्रचार-प्रसार से धीरे-धीरे अंधश्रद्धा और भ्रमपूर्ण बातों से निजात मिलने लगी है। पंचायतों की स्थापना हुई है तथा अनेक कार्यक्रमों से हमें लाभ हुआ है। अब सरकार का ध्यान हम किसानों के ऊपर बना रहता है।