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Monday, January 12, 2026

निबंध लेखन: आत्मकथा - एक अकाल पीड़ित की आत्मकथा Autobiography of a Famine Victim | Ek Akal Pidit Ki Atmakatha Hindi Essay

निबंध लेखन: आत्मकथा

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एक अकाल पीड़ित की आत्मकथा

‘‘का बरखा जब कृषि सुखानी।
समय चूकि पुनि का पछतानी।।’’

सौंदर्य, प्रेम तथा संवेदनाओं से भरी प्रकृति कभी-कभी रौद्र रूप भी धारण कर लेती है। उसका क्रोध कोई भी रूप ले लेता है। अकाल प्रकृति के क्रोध का एक अति भयानक, हृदय विदारक, रूह कँपा देनेवाला रूप है। साथियों आप समझ गए होंगे कि मैं कौन हूँ। जी हाँ, मैं एक अकाल पीड़ित हूँ, आप मेरी दर्द भरी व्यथा सुनना पसंद करेंगे।

ठीक है सुनिए, भारत जैसे कृषिप्रधान देश के लिए अकाल किसी भयंकर अभिशाप से कम नहीं। मेरे परिवार में मैं मेरी पत्नी तथा दो बच्चे व मेरी बूढ़ी माँ थी। मेरा गाँव खुशहाल था। सब एक दूसरे की मदद करते, लोगों का एक दूसरे के घर आना-जाना, लेन- देन होता था किन्तु किसी को क्या पता कि खुशहाल गाँव पर अकाल का ग्रहण लग चुका है। सब लोग भीषण गर्मी में तपते हुए मेघराज का बेसब्री से इंतजार करने लगे। आसमान में काले बादल आए परन्तु हल्की बूँदा-बाँदी के अलावा कुछ भी हाथ न लगा।

दिन पर दिन और महीने के महीने गुजर गए किन्तु बरखारानी हम सबकी दुश्मन बनी हुई थीं। पूरा वर्ष इंतजार में बीत गया, किसानों के घरों में अन्न की कमी पड़ने लगी और मँहगाई आसमान छूने लगी। लोग किसी तरह से एक-एक दिन मुश्किल से काट रहे थे। उम्मीद थी कि इस साल बरखारानी के आते ही सारे दुःख भाग जाएँगे परन्तु विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था।

दूसरा साल आया। लोग भूख-प्यास से तड़पने लगे। इस वर्ष भी मेघराज ने धोखा दिया। बच्चे बूढ़े सब दाने- दाने के मोहताज हो गए। गाय, भैंस को देखते ही आँखें बरसने लगती थीं, वे सिर्फ कंकाल बनकर रह गए थे। अचानक गर्मी बढ़ी पूरे गाँव में महामारी, हैजा फैल गया। लोगों के घरों में न अनाज का टुकड़ा बचा न तो एक बर्तन सब पेट की आग बुझाने में बिक गया, फिर भी पेट की आग जलती रही।

लोग मंदिरों में, मस्जिदों में पूजा, प्रार्थना दुआ माँगते रह गए किन्तु ऊपरवाले को दया नहीं आई। घर का घर महामारी की चपेट में आता गया और लोग मच्छर, मक्खी की तरह मरने लगे, साथ में जानवरों की भी वही हालत होती गई। होनी को भला कौन टाल सकता है? आखिर एक दिन मेरा घर भी महामारी के चंगुल में आ गया। मैं चीखता-चिल्लाता रहा किन्तु मेरी मदद कौन करता? सबके सामने तो एक ही समस्या थी। मेरी आँखों के सामने मेरी माँ, पत्नी तथा दोनों मासूम बच्चे चीखते-बिलखते मौत के मुँह में समा गए।

चारों तरफ महामारी का तांडव बढ़ता जा रहा था। गाँव के गाँव मौत के मुँह में समाते जा रहे थे। जिसे देखकर सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था प्रारंभ की। जगह-जगह पानी का टैंकर, खाने का पैकेट तथा डॉक्टर के द्वारा लोगों का इलाज व दवाइयों का वितरण किया जाने लगा। चंद दिनों में महामारी पर नियंत्रण कर लिया गया तथा सरकार के द्वारा कुँआ, तालाब, नलकूप आदि की खुदाई की जाने लगी। ‘मैं अभागा किस्मत का मारा’ न जाने किन कर्मों का फल मुझे भुगतना पड़ा। जो अपने परिवार के साथ न जी सका। न मर सका। ऐसे जीवन से तो मृत्यु ही अच्छी थी।

‘‘समझौता गमों से कर लो।
जिंदगी में गम भी मिलते हैं।’’
एक अकाल पीड़ित की आत्मकथा - Hindi Essay Image

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