निबंध लेखन: आत्मकथा
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एक फटी पुस्तक की आत्मकथा
हर पल सबको लुटाती हूँ,
भेदभाव नहीं मन में मेरे,
सबको मैं अपनाती हूँ।’’
मुझे पहचानना बहुत कठिन नहीं है। बचपन से लेकर अब तक किसी न किसी रूप में मैं आपके करीब रही हूँ। जी! मैं एक पुस्तक बोल रही हूँ। मेरी जीवन कहानी फिल्मी कलाकारों की जिंदगी के समान रोचक व आकर्षक नहीं है, पर भाव से भरी है। पेड़ की छालों की लुगदी व अन्य रासायनिक मिश्रण के द्वारा मुझे कागज का रूप दिया गया। विरंजक चूर्ण से साफ करके मुझे लिखने के लायक बनाया गया। इसके बाद छपाईखाने में मुझे लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा। मुझे वहाँ का वातावरण अच्छा नहीं लग रहा था। हर तरफ मशीनों की आवाजों से मैं जल्दी ही वहाँ से उब गई थी। वहाँ मेरे रंग-रूप को पूरी तरह निखारा गया। मुख्य-पृष्ठ को इस तरह सजाया गया था कि मैं अपनी सुंदरता पर इतराने लगी थी।
50+ Hindi Composition Collection - Click Hereकुछ ही दिनों बाद मुझे और मुझ जैसी अन्य पुस्तकों को गाड़ी में भरकर एक आलीशान दुकान में ले जाया गया। पर वहाँ मुझे ज्यादा दिन नहीं ठहरना पड़ा। वहाँ से मुझे एक बहुत बड़े ग्रंथालय में पहुँचा दिया गया। यह ग्रंथालय भी बहुत भव्य था। वहाँ लाखों की संख्या में किताबों को व्यवस्थित ढंग से सजाया गया था। नई जगह थी कुछ दिन तो मुझे बहुत अटपटा-सा लगा। पढ़नेवालों की भीड़ थी पर सब खामोश थे। मुझे यह खामोशी अच्छी नहीं लग रही थी। काफी अकेलापन महसूस कर रही थी पर बाद में अन्य पुस्तकों से दोस्ती हो गई इसलिए सबकुछ धीरे-धीरे ठीक लगने लगा। हर रोज पाठकों की भीड़ लग जाती थी। कुछ लोग पुस्तकें हफ्ते भर के लिए अपने घर ले जाते थे। मैं नई-नवेली दुल्हन की तरह सज-धजकर काँच की अलमारी में आराम कर रही थी। लंबे आराम के बाद मैं अब ऊब चुकी थी। आखिर मेरी भी बारी आई। एक पाठक को मेरी जरूरत पड़ी। दो घंटों तक ग्रंथालय में बैठकर मेरे पन्नों को पलटता रहा। बहुत विचित्र आदमी था। जिस क्रूरता से वह पन्ने पलट रहा था, मुझे तो लगा अभी मेरा ‘राम-नाम सत्य हो जाएगा’। मुझे बेहद पीड़ा हो रही थी। जल्दी ही मैं उसके चंगुल से बच गई।
दूसरे दिन एक युवक ग्रंथालय में आया। उसने मुझे बहुत ध्यान से देखा, फिर वह पन्नों को पलटने लगा। मेरे पन्नों पर लिखी कुछ बातें उसके काम की लगी। वह खुश हुआ परंतु बहुत आलसी था। मुझमें छपी जानकारी को अपनी पुस्तिका में लिखने के बदले उसने बड़ा ही कठोर और निर्दयी तरीका अपनाया। एक ‘ब्लेड’ से मेरे कुछ पन्नों को फाड़ने लगा। मैं कराह उठी। मदद के लिए पुकार रही थी, पर जैसा कि किसी शायर ने कहा है - ‘‘पुकारता रहा किस-किस को डूबनेवाला, खुदा थे इतने मगर, कोई आड़े न आया।’’ मेरी भी चीख अनसुनी कर दी गई। एक के बाद एक करके करीब सात-आठ पन्ने फाड़े। इसके बाद धीरे से मुझे ग्रंथपाल को सौंपकर चुपचाप चला गया। ग्रंथपाल ने मुझे अलमारी में रख दिया। मेरे जख्मों पर कोई मरहम लगानेवाला नहीं था। मैं रोती-तड़पती रही। एक दिन एक सज्जन मुझे अलमारी से निकालकर पढ़ने बैठे, पर मेरी क्षतिग्रस्त अवस्था को देखकर नाक-भौं सिकोड़ने लगे और आखिर में मुझे ग्रंथपाल के हाथों सौंप दिया। ग्रंथपाल के लिए यह मालूम कर पाना मुश्किल हो गया कि आखिर मेरी इस हालत का जिम्मेदार कौन है? जो भी हो, पर मैं अब किसी काम की नहीं थी। मुझे अधूरा समझा जाने लगा। तब से लेकर अब तक मैं अलमारी में पड़ी हूँ। लोगों को ज्ञान की रोशनी देनेवाली खुद अंधेरों में कैद हो गई। मैं आज किसी और के बुरे कर्मों की सज़ा भुगत रही हूँ।
मैंने कभी सोचा नहीं था, इतनी कम उम्र में मुझे लोगों की उपेक्षा झेलनी पड़ेगी। एक जमाना था जब माँ-बाप पुस्तक को विद्या मानकर पूजते थे और यही संस्कार बच्चों में डालते थे पर अब सोच बदल गई है। खैर! अब शिकायत करके भी क्या फायदा। बस, मैं आप सबसे यही कहना चाहूँगी कि पुस्तकें आपकी सच्ची साथी हैं। क्यों! क्या हो गया? आप तो उदास हो गए।
ये हमारी चाहतों से नहीं, अपने हिसाब से चलती है।।’’